रोहतास (बिहार):
रोहतास ज़िले के लोथ प्रखंड में भदोखरा पंचायत से संबंधित, ₹51 लाख की योजना रोहतास, वर्तमान में चर्चित विषय बन चुकी है। यह योजना बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग द्वारा स्वीकृत है और इसकी कुल लागत ₹51,71,670 बताई गई है। हालाँकि, यह योजना जमीन पर अपने प्रभाव को लेकर कई सवालों का सामना कर रही है।
यह योजना भदोखरा पंचायत से शिवपुर की ओर जाने वाले रास्ते और आहर (जल संरचना) से जुड़ी बताई जा रही है। स्थल पर लगाए गए सरकारी बोर्ड के अनुसार, योजना की शुरुआत 5 मई 2025 को हुई थी और इसकी समाप्ति तिथि 14 नवंबर 2025 दर्ज है। बोर्ड पर संवेदक का नाम भी अंकित है, हालांकि संपर्क विवरण उपलब्ध नहीं है।
इस संदर्भ में, ₹51 लाख की योजना रोहतास ने स्थानीय समुदाय के विकास पर सकारात्मक प्रभाव डालने का वादा किया है।
ज़मीनी स्थिति क्या कहती है? क्या वास्तव में ₹51 लाख की योजना रोहतास के लाभार्थियों तक पहुंच पाई है? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
₹51 लाख की योजना रोहतास: क्या है इसका महत्व?
मौके पर जो स्थिति दिखाई देती है, वह मुख्यतः एक मिट्टी के रास्ते तक सीमित नज़र आती है। आहर के जीर्णोद्धार या स्थायी जल संरचना से जुड़ा कोई स्पष्ट निर्माण कार्य दिखाई नहीं देता। स्थानीय लोगों के अनुसार, सीमित स्तर पर जेसीबी मशीन से मिट्टी की कटाई-भराई की गई, लेकिन उसके बाद कोई ठोस या टिकाऊ कार्य नहीं हुआ।
स्थानीय लोगों का मानना है कि इस योजना का कार्यान्वयन सही तरीके से नहीं किया गया है, जिससे उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। लोग चाहते हैं कि उन्हें जल संसाधनों का सही उपयोग मिल सके।
ग्रामीणों का कहना है कि बारिश के दौरान यह मिट्टी बह जाने की आशंका बनी रहती है, जिससे काम की उपयोगिता पर सवाल उठते हैं। वहीं, धूल और अव्यवस्था से लोगों को दैनिक जीवन में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
योजना का उद्देश्य और अहमियत
जल संसाधन विभाग की ऐसी योजनाओं का उद्देश्य आमतौर पर जल संरक्षण, सिंचाई सुविधा में सुधार और ग्रामीण इलाकों में जल प्रबंधन को बेहतर बनाना होता है। आहर जीर्णोद्धार जैसी योजनाएँ खेती और ग्रामीण आजीविका से सीधे तौर पर जुड़ी होती हैं। ऐसे में ज़मीनी स्तर पर इनका प्रभावी क्रियान्वयन बेहद ज़रूरी माना जाता है।
प्रक्रिया और जवाबदेही का सवाल
नियमों के अनुसार, किसी भी सरकारी योजना में कार्य की गुणवत्ता की जाँच, तकनीकी स्वीकृति और विभागीय निरीक्षण अनिवार्य होता है। भुगतान से पहले कार्य की भौतिक पुष्टि (फिजिकल वेरिफिकेशन) भी प्रक्रिया का हिस्सा होती है।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि—
- योजना के तहत ज़मीन पर वास्तव में कौन-कौन से कार्य पूरे किए गए?
- क्या कार्य की गुणवत्ता का तकनीकी निरीक्षण हुआ?
- आहर और जल निकासी से जुड़ी व्यवस्था वर्तमान में किस स्थिति में है?
- भुगतान से पहले किस स्तर पर सत्यापन किया गया?
सिर्फ एक पंचायत नहीं, बड़ा मुद्दा
यह मामला केवल भदोखरा पंचायत तक सीमित नहीं माना जा रहा। जानकारों का कहना है कि यदि योजनाओं की निगरानी और पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, तो इससे आम जनता का भरोसा प्रभावित होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास योजनाओं का असर तभी दिखता है, जब उनका लाभ ज़मीन पर स्पष्ट रूप से नज़र आए।
आगे क्या?
फिलहाल, ज़रूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग ज़मीनी स्थिति का निरीक्षण कर स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करे। यदि कहीं कमियाँ हैं, तो उनके सुधार की प्रक्रिया भी बताई जाए। जवाबदेही तय होना ही ऐसे मामलों में विश्वास बहाल करने का एकमात्र रास्ता माना जाता है।
यह रिपोर्ट तथ्यों और स्थल पर दिखाई देने वाली स्थिति के आधार पर तैयार की गई है। अब सबकी निगाहें इस पर हैं कि संबंधित विभाग इन सवालों पर क्या जवाब देता है।
